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Sharnagat

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Rs 200.00
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ISBN:
978-81-89962-88-3
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Preface

शरणागत 

तिष्यरक्षिता गुरुगृह में सम्राट अशोक की वासना का शिकार हुईं। गुरु के आदेश पर अशोक ने उनसे विवाह किया, किन्तु मगध की सीमा पर ही छोड़ गये।

उपन्यास की शुरुआत उस दिन से होती है जब चन्द्राशोक धर्माशोक बनने के बाद तिष्या को लेने आते हैं, और तिष्या सोलह श्रृंगार करके बरसों बाद अपने बहुप्रतिक्षित पिया से मिलने जाती है। परन्तु अशोक को देखते ही उसे झटका लगता है, क्योंकि जिस नवयुवा के लिए उसने अपना संपूर्ण यौवन यूं ही तपस्विनी की भा¡ति बीता दिया, आज वह एक लोलचर्मवृद्ध के रूप में खड़ा था। उसने अपने पिता के सामने ही उसे अपना पति मानने से इनकार कर दिया। मगर एक समझौते के बाद वह मगध चली आयी।

तिष्या के महारानी पद के अभिषेक के दिन अपने पति अशोक के कनिष्ठ राजकुमार कुणाल को देखकर तिष्या स्तब्ध रह गई। हू-ब-हू अशोक के नवयौवन का प्रतिरूप। तिष्या उसके प्रेम में विभोर हो गई। तिष्या को उसमें विलीन होने में ही अपनी पूर्णता नज़र आयी। किन्तु तथागत के शरणागत कुणाल द्वारा तिष्या केवल तिरस्कृत ही हुईं।

तिष्या ने उनको पाने के लिए अपना जीवन, अपना सम्मान, अपनी प्रतिष्ठा सब कुछ दांव पर लगा दिया। लेखक ने तिष्या की प्रकृति को जिस सांचे में ढाला है, वह शायद इस युग में भी अकल्पनीय है। जिस पाप का पौधा अशोक ने रोपा था, वही आज उनके विषवृक्ष के रूप में पनप गया था।

तिष्या और कुणाल के संपर्क की परिणति क्या हुई? मानव-मन के अद्भुत मनोवैज्ञानिक विश्लेषण की एक मर्मस्पर्शी कथा है : शरणागत।


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