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Sujan Harbola / Gangaram Ki Takdeer

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Rs 55.00
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ISBN:
81-89850-43-2
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Preface

सुजन हरबोला 

सुजन के पिता का नाम दिवाकर था। उसकी किराने की दुकान थी। सुजन की बड़ी बहन की शादी हो गई थी, और उसके बड़े भाई की मौत तीन साल पहले हो चुकी थी। सुजन ने उसे देखा नहीं था। सुजन की माँ बहुत सुन्दर थी। सुजन को भी माँ जैसा ही रूप मिला था। उसका रंग भी गोरा था।

दिवाकर चाहता था, सुजन पढ़-लिख जाय। इसीलिए उसने सुजन को हारान पण्डित की पाठशाला में भर्ती  कर दिया था। लेकिन सुजन का मन पढ़ाई में नहीं लगता था। वह अपना बस्ता लेकर पाठशाला में चुपचाप बैठा रहता और पेड़ों पर बैठी चिड़यों की आवाज सुनकर मन-ही-मन उनकी आवाज की नकल करने के बारे में सोचता। पण्डितजी जब उसे पांच का पहाड़ा सुनाने के लिए कहते तो वह कहता—'पांच एक्कम पांच, पांच दूना बारह, पांच तिगुने अठारह।'  पण्डितजी ने उसका कान पकड़कर कक्षा में खड़ा कर दिया। उस हालत में खड़े-खड़े उसका मन पेड़ों पर बैठी तरह-तरह की चिड़यों की बोलियों पर चला गया। वह सोचने लगा, न जाने कब इस पाठशाला से छुट्टी  पाकर इन सभी चिड़यों की बोली नकल करने का उसे मौका मिलेगा।


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