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Sunita Jain Samagra

Price:
Rs 7,500.00
ISBN:
978-81-908653-5-7
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Preface

सुनीता जैन का साहित्यिक कद बहुत ऊँचा है और अपने बहुवर्णी विस्तार में उनकी काठी (यशकाया) सुविस्तृत कविता, कहानी, उपन्यास, आत्म-कथा, आलोचना—इतनी सारी विधाओं में जितने अधिकारपूर्वक उन्होंने निरन्तरता में लिखा है और निरन्तर श्रेष्ठ, वह विस्मित करता है।
प्राय: पचास बरस तक निरन्तरता में श्रेष्ठ सृजन किसी भी साहित्यकार के लिए स्पृहा का विषय है।
सुनीता जैन ने गुणात्मक और परिमाणात्मक दोनों दृष्टियों से श्रेष्ठ और विपुल साहित्य-रचना की है, चौदह खण्डों में उनके अब तक प्रकाशित हिन्दी साहित्य को प्रस्तुत करने का यह प्रकल्प इसी उद्देश्य की सम्पूर्ति का उपक्रम है।
सुनीता जैन के बहुआयामी साहित्यिक अवदान की केन्द्रीयता में उनकी कविता ही है।
उनके संग्रह जिस रूप में आये हैं,वह विस्मित करने के लिए पर्याप्त है। कठिन प्रकाशन-काल में उनके संग्रह निरन्तर,और बलपूर्वक कहूँ तो, धड़ाधड़ छपे हैं। अपने निरन्तर प्रयत्नों से उन्होंने जिस मोहक साज-सज्जा, गैट्-अप, में इन पुस्तकों का मुद्रण कराया है, जिस अध्यवसाय और जिस निष्ठा से देश के प्रतिष्ठित चित्रकारों से उन्होंने चित्र प्राप्त कर प्रकाशन की अनुमति ली, जिस प्रकार श्रेष्ठ रेखांकन उन्होंने कुशल चितेरों से कराये, उसे मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ।
सुनीता जैन का काव्य-संसार पर्याप्त वैविध्य और विस्तृति लिए हुए है,फिर भी प्रेम उनके काव्य की नाभिकीय धुरी है। प्रेम स्त्री-पुरुष सम्बन्धों के सन्दर्भ में तो विविध उल्लासों-संवेदनों (मूड्स)और अपने विभिन्न रंगों में अभिव्यक्ति पाता ही है,यह प्रेम पारिवारिक सम्बन्धों में अपनी निजता में निराली अभिव्यक्ति पाता है।
वस्तुत: सुनीता जैन की कविता एक साथ ही, प्रेम की सान्द्र अनुभूतियों का अनूठा संसार और संभारं, अपनी प्रखर बौद्धिकता में आधुनिक सोच,युग-प्रश्नों से मुठभेड़ करने का मनोबल और हृदय की अतल गहराइयों को संस्पर्श करने वाली भाषा सामथ्र्य और काव्यात्मक संवेदन लिए हुए हिन्दी काव्य को एक समृद्धि, अपने तरह की सम्पन्नता और सम्पदा प्रदान करती हैं।
सुनीता जैन का कथा साहित्य भी 5-5उपन्यासों और 6-7कहानी-संग्रहों की विस्तृति में फैला हुआ है। उन्होंने गुणात्मक और परिमाणात्मक दोनों ही रूपों में हिन्दी कथा-साहित्य को समृद्धि प्रदान की है। मैं उनके साहित्य का पाठक उनकी कहानियों से ही बना। शब्द की इस साधिका ने जिस रूप में अपनी साहित्यिक यात्रा तय की है, उसका आत्म विवरण उन्होंने बहुत ईमानदारी से अपनी शब्दकाया शीर्षक आत्मकथा में दिये हैं
शब्दकाया को पढक़र यह अवश्य अनुभव होता है कि किस प्रकार एक जीवट वाली स्त्री लगभग ‘अथ’से प्रारम्भ कर शिक्षा-क्षेत्र और साहित्य संसार में इन ऊँचाइयों तक पहुँची है।
ऐसे कृती व्यक्तित्व की सृजन-यात्रा को एक स्थान पर चौदह खण्डों में प्रस्तुत करने का यह समायोजन हिन्दी संसार को सौंपते हुए हम हर्ष और गौरव का अनुभव कर रहे हैं,इस आस और विश्वास में कि उनके साहित्य-प्रेमियों को उनका समग्र साहित्य एक ही स्थान पर सहज रूप में सुलभ होगा,अनेकानेक विश्वविद्यालयों के शोध छात्र उनके साहित्य की तलाश में इधर-उधर नहीं भटकेंगे, साहित्य-समीक्षा उनके अवदान का समुचित और सम्यक् मूल्यांकन कर सकेगी, परिवार और साहित्य की भावी पीढिय़ाँ इस धरोहर को सहेजकर रख गौरवान्वित होंगी।
—पुष्पपाल सिंह

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