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Swttav Ka Sammohan

RRP:
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ISBN:
978-81-89962-20-3
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Preface

स्वत्व का सम्मोहन 

'जिस देश में पचास से अधिक करोड़ लोगों' की भाषा हिन्दी हो, जिस देश का मिथक लोक उत्तर से लेकर दक्षिण तक लगभग समान हो, उस देश में अंग्रेजी जैसी आयातित भाषा में, काव्य रचना करने का संकल्प खासा दुस्साहसी संकल्प है। फिर भी तरु दत्त से लेकर आज तक अनेक कवि हुए हैं, और हैं, जिन्हें लगता है वे अपनी उलझी, सान्द्र, विविक्त अथवा विपर्यस्त अनुभूति को मात्र अंग्रेजी भाषा में व्यक्त कर सकते हैं। के. जयकुमार भी इसका अपवाद नहीं।

हिन्दी अनुवाद में उनकी यह काव्य कृति एक प्रेमगाथा है। प्रेम का घटित होना अनान्य है। 'वह हो जाता है।' क्यों होता है, इसपर अनेक खोजियों ने तरह-तरह के निर्णय दिये हैं। उसे हम रासायनिक उद्वेलन कहें अथवा फिर नसों में बहती काम ऊर्जा का उत्पात, फिर भी प्रेम होता तो है। अपनी उदयवेला में प्रेम अत्यधिक सुकोमल पवित्र और इन्द्रधनुषी ही होता है। प्रेम में दो का होना जरूरी है; भले ही दूसरा अशरीरी हो। शरीरी प्रेम में, प्रेम एकान्त चाहता है। दोनों चाहते हैं कि उनका संसार एक खास तरह के आवेष्ठन के भीतर बन्द हो जिसे किसी की हवा तक न लगे। एकान्त से आगे प्रेम तड़पता है कि दोनों एक-दूसरे में समा जाएँ—द्वैत मिट जाये। के. जयकुमार की कृति में भी प्रेमगाथा कुछ इसी तरह आगे बढ़ती है।

अनुवाद कठिन कार्य है, फिर कविता का अनुवाद तो और भी अधिक कठिन, क्योंकि वहा¡ संवेदना को एक भाषा से दूसरी भाषा में लाना पड़ता है। इस दृष्टि से अनुवाद पठनीय और चुस्त बन पड़ा है। अनुवादक मोहिनी हिंगोरानी ने काफी परिश्रम कर, शब्दों के चयन पर इन अंशों तक मनन किया है कि मूल रचना पर, लगता है, आंच आनेवाली ही है, मगर थमकर दोबारा पढ़ने पर यह शंका निर्मूल हो जाती है और यह आश्वस्ति भी होती है कि कविता के अनुवाद के लिए वे उपयुक्त चुनाव हैं।

—(डॉ. कैलाश वाजपेयी)


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