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Tappar Gari

Price:
Rs 245.00
ISBN:
978-81-89962-89-3
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Preface

टप्पर गाड़ी

किशोर कथा साहित्य के विमर्श कथाकार के नाते द्रोणवीर कोहली एक प्रतिष्ठित नाम है। ‘टप्पर गाड़ी’किशोर-किशोरियों के लिए उनका पहला मौलिक उपन्यास है, जो सम्भवत: हिन्दी में इस वय-वर्ग के लिए इतने बड़े आकार की पहली रचना है।

‘टप्पर गाड़ी’ में उस प्राचीन काल की कहानी है जब ग्रीक देश से आनेवाला सिकन्दर भारत पर आक्रमण करने के लिए सिन्धु नदी के तट पर डेरा डाले पड़ा था और पश्चिमोत्तर भारत में उथल-पुथल मची थी। इस सबसे अनभिज्ञ एक ग्रामीण युवक और उसकी पत्नी अपनी जन्मान्ध कन्या के उपचार के लिए टप्पर गाड़ी में बैठकर तक्षशिला जा रहे हैं जो सिन्धु नदी के तट से अधिक दूर नहीं है। मार्ग में इन्हें अनेक जोखिमों का सामना तो करना ही पड़ता है, तक्षशिला पहुँचने पर वे कैसी विकट स्थिति में फँस जाते हैं, इसकी रोमांचकारी कहानी इस उपन्यास में है।

किशोर कथा साहित्य में यों ऐतिहासिक उपन्यासों का नए इतिहास-बोध से कोई सरोकार नहीं। ‘टप्पर गाड़ी’ उपन्यास नये इतिहास-बोध से बहुत गहरे जाकर जुड़ता है। इसमें किसी ऐतिहासिक पात्र को नये सन्दर्भ में नहीं रखा गया है, बल्कि एक इतिहास-काल को उसके समूचे जनपदीय परिवेश के माध्यम से उजागर किया गया है। इसके साथ ही उस समय के समाज में शोषक शक्तियों का भी बड़ी कुशलता से चित्रण किया गया है। लेखक की यह दृष्टि वर्तमान समाज की भी पहचान कराती है।

यशसवी  कवि और ‘धर्मयुग’ के सम्पादक धर्मवीर भारती ने इस उपन्यास की प्रशंसा करते हुए लिखा था :‘‘उपन्यास ‘टप्पर गाड़ी’ मिलते ही पढ़ डाला और सच बात तो यह है कि बहुत ही अच्छा लगा। उस समय की संस्कृति के छोटे-छोटे विस्तारों का सजीव वर्णन, अनेक अविस्मरणीय पात्र और कहानी में बिना किसी ‘गिमिक’ के बाँधे रखने की क्षमता, बिना पढ़े रेखा ही नहीं गया...’’


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