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Teesri Naak / Bhirant

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ISBN:
81-89914-19-7
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Preface

तीसरी नाक / भिड़न्त 

इलाके में उसकी तूती बोलती थी। रामपुर के मेले में एक से बढ़कर एक नामी भेड़ें आये थे मगर वे उसके वार से हार कर दुम दबाकर भागे। चौड़ा मस्तक, ऐंठी हुई मजबूत सींगें! जब वह दम साधकर पीछे हटता और दौड़कर दूसरे भेडे़ को टक्कर मारता तो ठहाक की आवाज होती, जैसे नगाड़े पर चोट पड़ी हो। दो-तीन वार में ही प्रतिद्वन्द्वी पराजित! मगर रामपुर के मेले में वह एक मरियल भेड़े से हार गया। मेले में दंगल बदा था। बलेसर के भेड़े ने पीछे हटकर इतने जोर से वार किया कि सामने पहाड़ भी होता तो दो फाड़ हो जाता, मगर दूसरे भेडे़ को क्या जाने क्या सूझी। वह अचानक ही बैठ गया और अपने ही वेग से धरती से टकराकर टूट गया बलेसर का भेड़ा। इस प्रकार हमारे गाँव की दूसरी नाक भी कट गई।

गाँव की तीसरी नाक थे—गोमू पहलवान। उनका असली नाम तो कुछ और ही था। मगर उनके बल-पौरुष से मुग्ध गाँव वाले उन्हें रुस्तम-ए-हिन्द गामा के नाम से जोड़ते हुए गोमू कहते थे। गोमू के बारे में प्रसिद्ध था कि उन्हें बजरंगबली का आशीर्वाद प्राप्त है और वह किसी से भी पराजित नहीं हो सकते। गाँव में हर घर से उनके लिए रसद, सब्जी और दूध बंधा हुआ था। बंधा क्यों न होता! आखिर वे गाँव की नाक थे। दो नाकों के कट जाने के बाद गाँव की बची इकलौती नाक।


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