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Thug

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ISBN:
81-903688-0-6
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Preface

ठग 

अपराध जगत के इतिहास में कहीं भी, कभी भी 'ठग' से ज्यादा खतरनाक अन्य हत्यारों का ज़िक्र नहीं मिलता है। लगभग दो शताब्दियों तक ऐसे भयानक हत्यारों के समूह ने भारत के तमाम व्यापार मार्गों में अपने आतंक का जाल फैलाये रखा और लाखों यात्रियों की बेहिचक हत्या की।

ठग प्राय: सहयात्री के रूप में लम्बी यात्राओं पर निकलते और अपने विशेष संकेत भाषा के माध्यम से अपने गुट के अन्य सदस्यों के साथ बराबर संवाद बनाये रखते थे जिससे कि उनके हाथों मरने वाले यात्रियों को इनके मंसूबों की जरा भी भनक नहीं लग पाती थी।

लोककथाओं जैसा आकर्षक किन्तु लगभग अविश्वसनीय, रोंगटे खड़े कर देनेवाली भयानक क्रूरता और छोटे-छोटे लाभों के लिए नरहत्या के इस दौर को खत्म करना शायद स्लीमैन जैसे कर्मठ और समíपत कर्मयोगी अधिकारी के लिए ही संभव था। शायद इसीलिए कर्नल स्लीमैन स्वयं लोककथा के महानायक के रूप में इतिहास के उन्हीं पन्नों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा गये जो ठगों के हाथों मारे गये निरीह राहगीरों के खून से रंगा हुआ है।

ठगों के बारे में जितनी भी मानक दस्तावेज मिले हैं उनके आधार पर श्रीपान्थ ने 'ठगी' शीर्षक से बांग्ला में अपनी पुस्तक प्रकाशित की है।

यह पुस्तक केवल ठगों के कार्यकलापों के बारे में ही नहीं बताती, बल्कि उनकी अपनी मान्यताओं, विश्वासों और धार्मिक उदारता के पक्षों को भी पाठकों के सामने उजागर करती है।


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