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Vamacharan Ka Khajana / Talnavmi

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ISBN:
81-89850-13-8
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Preface

वामाचरण का खजाना / तालनवमी 

वामाचरण को रातभर नींद नहीं आयी। सचमुच उसका भाग्य अच्छा नहीं था। ऐसी जगह पर गड़ा हुआ धन पाने के बावजूद उसमें से निकला काला अलकतरा। ऐसा न होता तो भला बम्पाश साहब की दी हुई ऐसी नौकरी वह भला छोड़ आता? पाकर खोना ही उसकी तकदीर में लिखा था।

दूसरे दिन सुबह कुछ लोगों को अलकतरा-जैसा वह पदार्थ दिखाने पर वे भी कुछ समझ नहीं पाये। आखिरकार महमूदपुर के बाजार में बूढ़े वैद्य ने उसे देखने के बाद कहा, 'यह पुराना घी है। बड़ा पुराना घी। तुम्हारे पास कितना है? यह बड़ा कीमती है। इसे बेचोगे? कलकत्ता के बहूबाजार के सेन की दुकान में यह तुरन्त बिक जाएगा।''

बूढ़े वैद्य को साथ लेकर वामाचरण कलकत्ता पहु¡चा।

बहूबाजार में सेनों की आयुर्वेदिक दवाओं की बहुत बड़ी दुकान थी। पूरे भारत में ही क्यों, पूरी दुनिया में उनका कारोबार चलता था। उस घी को देखकर वे बोले, 'हाँ, घी बहुत बढ़िया है, कम-से-कम दो सौ साल पुराना होगा ही। क्या यह तुम्हारे यहाँ था?''

वामाचरण ने संक्षेप में उस घड़े की कहानी बता डाली। इसके बाद मोल-भाव होने लगा। वे लोग सात रुपये से ज्यादा देने को राजी नहीं थे। फिर वे दस रुपये तक देने को राजी हो गये, मगर किसी भी हाल में इससे ज्यादा नहीं। अगर वामाचरण बूढ़े वैद्य के साथ न आता तो वह दो रुपये सेर के भाव से ही उसे बेच चुका होता।


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