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Wah Bhyanak Raat

RRP:
Rs 125.00
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ISBN:
81-89914-26-X
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Preface

वह भयानक रात 

बरसात जितनी तेज हो रही थी, हवा भी उतनी तेज चल रही थी। बाहर खड़ा रहना मुश्किल था। घर के नौकर-चाकर कहाँ थे, वे किस कमरे में रहते थे, गुरुदेव  को कुछ भी पता नहीं था। उन्होंने वहीं खड़े-खड़े हाक लगायी, पर कोई जवाब नहीं मिला। वहा¡ एक तरफ एक बेंच पड़ी थी। लालू के पिताजी के गरीब मुवक्किल आकर वहीं बैठते थे। लाचार होकर गुरुदेव वहीं बैठ गये। अपनी हालत देखकर उनके दिल को ठेस लगी, उन्हें बहुत बुरा लगा, मगर कोई चारा नहीं था। हवा के साथ पानी की बौछार भी उन तक पहुँच रही थी। वे ठण्ड से कांपने लगे थे। उन्होंने धोती के पल्ले को अपनी देह में लपेटकर, दोनों पैरों को भरसक ऊपर उठाकर, जितना हो सकता था अपने शरीर को गठरी बनाकर गर्म करने की कोशिश की। तरह-तरह की चिन्ताओं और परेशानियों से उनका शरीर बिलकुल जकड़ गया था। इसलिए उन्हें गुस्सा भी आने लगा था। नीन्द से उनकी पलकें भारी हो गई थीं, उस दिन भोजन भी उन्होंने कुछ ज्यादा कर लिया था, उस पर रात को वे सो भी नहीं पा रहे थे, इन सबसे उन्हें खट्टी डकारें आने लगीं। वे चिन्ता में पड़ गये।


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