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Ya Isliye

RRP:
Rs 250.00
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ISBN:
81-89914-17-0
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Preface

या इसलिए 

सुनीता जैन की कहानियों का यह संकलन घर और जीवन, स्त्री और पुरुष, वस्तुओं और इच्छाओं को अजायबघर में रेडक्रूस करनेवाली संस्कृति के विरुद्ध एक सक्षम प्रतिवाद है। उनका अधिग्रहण क्षेत्र देश से विदेश और कला की भिन्न-भिन्न सरणियों तक फैला है और कहानियों में सबकी गूँज-अनुगूँज ध्वनित होती रहती है। प्रवास, प्रवासी और आत्मनिर्वासित आत्माओं की पीड़ा और तड़प को भी लेखिका ने पहचाना कि देश बदलने से दुःख नहीं बदल जाता।

सिमटती दूरियों और फैलते सरोकारों के बीच समकालीन भारतीय परिदृश्य में सुनीता जी की कहानियां और भी अधिक समकालीन हो उठी हैं जो यह बताती हैं कि देश भूगोल में बंधा कोई बन्द भू-भाग नहीं है, वह हमारे खून में दौड़ता एक जीवन विचार है, वह हमारे खून में दौड़ता एक जीवन्त विचार है, कि आदमी के भीतर का द्वन्द्व वास्तव में आदमी के भीतर और बाहर के देशों का द्वन्द्व ही है, कि देश एक ऐसी दृष्टि है जिसके एक कोण से कई दृष्टिकोण सृजित होते हैं।

आशा है, पाठकों को सुनीता जी की ये कहानिया अपने जीवन और जगत ही नहीं, अपने देश और विदेश का भी पुनराविष्कार करने में मदद करेंगी।


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